Tuesday, 20 May 2014

फिर क्यूँ ???

ईमान से बढ़कर कोई धर्म नहीं होता है ,
फिर क्यूँ चुनाव हार जाता है ईमानदार ...

जिसका कोई  नहीं होता उसका खुदा होता है ,
फिर क्यूँ गरीब रह जाता है हर बार  लाचार ...

कहते है बच्चे भगवान का रूप होते है ,
फिर क्यूँ सड़क सड़क पर है बच्चे बीमार ....

अन्नदाता से बड़ा किसी का दर्जा नहीं होता ,
फिर क्यूँ आत्महत्या करता है जमींदार ...

मिला है लोकतंत्र मे सबको  समानता का अधिकार ,
फिर क्यूँ हर जगह है अमीरी और गरीबी की दीवार ....

रामायण सिखलाती है जीतती है अछाई हर  बार,
फिर क्यूँ समाज में है बुराई अपरंपार ....

गणतंत्र का मतलब नहीं है कारोबार ,
फिर क्यूँ राजनीती में है सिर्फ परिवार ....

कहते है बेखौफ जियो, रक्षा कर रहे है पहरेदार ,
फिर क्यूँ सर काट ले जाते है देश के गद्दार ....

कानून के हाथ बहुत लंबे होते है ,
फिर क्यूँ सड़क पर घूमता है गुनेहगार ....

सभी  धर्मों  की मंजिल एक  ही  होती  है ,
फिर क्यूँ  बनाये गये है धर्म के ठेकेदार ...

जिंदगी  मे इज्जत से बढ़कर नहीं होता कोई भी मुकाम ,
फिर क्यूँ उछाली जाती है गरीब की पगड़ी बार - बार ...

विवेकानन्द ने कहा ,
कपड़ों से नहीं चरित्र से पहचाना जाता है इंसान ,
फिर क्यूँ शकल - सूरत के आगे तमाम चरित्र बेकार ...

सुना है सिदत्त से चाही हुई चाहत बेकार नहीं जाती ,
फिर क्यूँ आखिर में हार जाता है सच्चा प्यार ,
फिर क्यूँ आखिर में हार जाता है सच्चा प्यार...